सांकरी खोर
सांकरी यानी सँकरी और खोर यानी गली। यहाँ ब्रह्मा पर्वत और विष्णु पर्वत इतने पास आ जाते हैं कि दो लोग मुश्किल से निकलें, और ब्रज कहता है कृष्ण ने बरसाना की गोपियों को रोककर दान माँगने के लिए यही जगह चुनी।
दान लीला
सखियाँ दही और माखन की मटकियाँ बेचने इसी गली से निकलती थीं। कृष्ण और उनके सखाओं ने रास्ता रोका और ख़ुद को ब्रज का दानी घोषित किया: दान दिए बिना कोई नहीं जाएगा, यानी दही में हिस्सा। सखियाँ बहस करती रहीं, कृष्ण भी, मटकियाँ फूटीं, और दान कभी किसी ने नहीं दिया। बहस ही लीला है।
गली के पश्चिम की चोटी दानगढ़ इसी से नाम पाती है, जिस पर दान बिहारी, दान लेने वाले कृष्ण, का मंदिर है। पूर्व में विलासगढ़ है।
यहाँ होने वाली लीलाएँ
| कब | क्या |
|---|---|
| राधाष्टमी के तीन दिन बाद, एकादशी | बूढ़ी लीला: दान लीला की बड़ी बहस, सांकरी खोर में गाई और खेली जाती है |
| दो दिन बाद, त्रयोदशी | मटकी लीला: दही की मटकियाँ फोड़ी जाती हैं, जैसे कृष्ण ने फोड़ी थीं |
| हर दिन | परिक्रमा वाले यहाँ रुकते हैं, और कीर्तन मंडलियाँ दान लीला के पद गाती हैं |
लीला के दिन मान मंदिर सेवा संस्थान के अनुसार।
जाने से पहले
- यह परिक्रमा मार्ग पर खुली गली है, चिकसौली गाँव के उत्तर में, इसलिए खुलने बंद होने का समय नहीं है। गर्मी से पहले, सुबह आइए।
- पत्थर घिसकर चिकना हो गया है और कहीं कहीं गली खड़ी है। पकड़ वाली चप्पल; बारिश में सँभलकर।
- लीला के दिन भीड़ भर जाती है। एक घंटा पहले आइए और ऊपर चट्टानों पर जगह लीजिए।
सांकरी खोर
बरसाना में सांकरी खोर क्या है?
ब्रह्मा पर्वत और विष्णु पर्वत के बीच की सँकरी गली जहाँ कृष्ण ने राधा की सखियों को रोककर दही का दान माँगा, यानी दान लीला। सांकरी यानी सँकरी, खोर यानी गली।
सांकरी खोर कहाँ है?
बरसाना परिक्रमा पर, चिकसौली गाँव के उत्तर में, पश्चिम में दानगढ़ और पूर्व में विलासगढ़ के बीच।
सांकरी खोर में बूढ़ी लीला कब होती है?
राधाष्टमी के तीन दिन बाद एकादशी को। मटकी लीला, जब दही की मटकियाँ फूटती हैं, त्रयोदशी को होती है।
सांकरी खोर का समय क्या है?
यह खुली गली है, इसलिए कोई तय समय नहीं। सुबह जल्दी सबसे अच्छा है।
दान बिहारी मंदिर क्या है?
सांकरी खोर के पास दानगढ़ की चोटी पर मंदिर, जहाँ कृष्ण दान लीला के दानी रूप में पूजे जाते हैं।
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